रचनाएँ

रविवार, 6 सितंबर 2009

आज की नारी

आज की नारी जो है सबकी प्यारी
मात पिता की बड़ी दुलारी
घर में सुनती सबकी बारी बारी
फिर भी कितनी अकेली हे बेचारी

हर दम उसे ही करना होता बलिदान
अपनी खुशियों और सपनो का
सबकी रखती है वो लाज
होकर विदा जाती ससुराल
खाकर कसम कह देती वो
दुःख सुख में दूँगी पति का साथ

हर बार उसे ही देनी होती हे अग्नि परीक्षा
पति शादी के बाद देखे किसी और नारी की ओर
उसे कोई कुछ नही कहता पत्नी देखे किसी ओर की ओर
उसे सब कहते शर्म नही आती पति के होते हुए देखती हे
किसी ओर को एक नारी कहती हे दूसरी नारी से
क्यों ऑरत ही ऑरत की दुशमन हे
क्यों हे नारी लाचार
सब कुछ सहती गे पत्नी धर्म निभाती हे
परिवार को सुखी ओर खुशहाल बनती हे
सबकी खुशी का कह्यल रखती हे
पैर उसकी क्या खुशी हे ये कोई नही जानता
कितनी हे बेबस नारी
मैं आज की हर नारी से यही कहती हूँ
सभी रिश्ते निबाहो खुशी से
पैर अपनी भी कोई पहचान बनाओ
न जियो किसी की दम पर
खड़ी हो जाओ अपने अपने पैरो पर
छु लो अस्मा किसी से न रहो पीछे
हम क्या नही कर सकते मर्दों का हेर काम अब्ब हम भी हे करते
पर मर्द नही चला सकते हमरी तरह घर न ही बना सकते हे परिवार खुशहाल
अपने सपना न करो कुर्बान बनाओ अपनी अलग पहचान
कितनी हे बेबस नारी

2 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सुन्दरता से चित्रण किया है, बधाई.

alka sarwat ने कहा…

भाई निर्भय जी ,नारी इतनी बेचारी नहीं है ,
लेकिन आपसे मेरे कई निवेदन हैं जिन्हें मैं काफी दिनों से कहना चाह रही हूँ ,मगर आपके यहाँ से बार -बार खराब मूड लेकर बिना कुछ कहे ही चली जाती हूँ
१ - हिन्दी मैं मस्ती का अर्थ समझ में नहीं आता ,इसे हिन्दी में मस्ती लिखा होता तो कितना अच्छा लगता २- गर्दू गाफिल जी से ज़रा रचनाएं त्रुटी-हीन करवाकर प्रकाशित करते
३- हिन्दी साहित्य में सर्जना का एक ऊंचा स्टार है ,वहाँ तक नहीं पहुँच सकते तो उसके आस-पास रहने की कोशिश करते
देखिये अपनी शिकायत मैंने सिर्फ इसलिए दर्ज करायी है ताकि आने वाली पीधिया ये कह कर हमें न कोसें की हिन्दी साहित्य का astar गिरते हुए देख कर भी हम मूक -दर्शक बने रहे

 

Softwares

इन्हें भी देखे

Registration on my Blog

Name:
Email Address:
Blog Url
Contact No.
RSS or ATOM feed of your blog

form mail

ब्लॉग सूची