रचनाएँ

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009

गजल

http://www.bau-xi.com/dynamic/images/display/Jude_Griebel_The_lonely_painting_12128_38.jpg

आप लोगों की दी हुई,
मोहब्बत पर इठलाता हूँ।
मैं इतने दिलों में रहता हूँ,
कि घर का पता भूल जाता हूँ।।

नहीं हुनर किसी में मेरे जैसा,
मैं लोगों को ऊंगलियों पर नचाता हूँ।।

कुछ लोग मुझे फरिश्ता कहते हैं,
मैं नफरत के स्कूलों में मोहब्बत पढ़ाता हूँ।।

खुशियों के बाजार में मेरी भी दुकान सजी है,
मैं आवाज लगा-लगाकर सौदागरों को बुलाता हूँ।।

नहीं यकीं तो तू भी मुझसे मिलकर देख,
देख किस तरह मैं तुझे अपना बनाता हूँ।।

3 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

वाह!! बहुत बढिया रचना है। बधाई।

अर्शिया ने कहा…

बहुत ही प्यारे भाव हैं, बधाई।
--------------
स्त्री के चरित्र पर लांछन लगाती तकनीक
आइए आज आपको चार्वाक के बारे में बताएं

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत अच्छी ग़ज़ल...वाह...
नीरज

 

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