रचनाएँ

सोमवार, 22 मार्च 2010

एक नाज़ुक सी लड़की


एक नाज़ुक सी लड़की
नर्म सा एक दिल था
शर्म उसका सिंगार था
कर्म मैं ही जीवन था
धर्म मैं मिलता सकून था

एक नाज़ुक सी लड़की
आँखों मैं सपने थे
आशाओं के गुल्दास्ते थे
सब को खुश रखने के अरमान थे
आस्मां को चुहने के इज़हार थे

एक नाज़ुक सी लड़की
सच का रास्ता ही अपना था
हर इंसान रब का ही तो रूप था
मुश्किलों से डरना नही था
काली घटा मैं भी दीखता सूरज था

एक नाज़ुक सी लड़की
जालिमों को नही दिखा उसका प्यार
बेदर्दी से करदिया वजूद को पार
दिल मैं थी बोहोत सारी झंकार
लेकिन ज़िन्दगी ने दिया उसे मार

एक नाज़ुक सी लड़की
अब कहाँ है उसकी मंजिल
वोह तो होगा ही बे महफ़िल
बस एक ही बात बोले ज़ख़्मी दिल
ओह मेरे रब--नूर मुझसे मिल.......

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