रचनाएँ

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

अभी अभी मेरे दिल में ये सवाल आया है


अभी अभी मेरे दिल में ये सवाल आया है
ये कैसी जिंदगी जिसमें मौत का साया है
क्या लेकर आये थे हम इस दुनिया में
जो कुछ है पास हमारे यही पर कमाया है
         अभी अभी मेरे दिल में--------

रोज़ी रोटी के चक्कर में दुनियादारी भूल गये
दौलत के लालच में जाने कितनो को सताया है
क्या अपना क्या तेरा है ये हमें मालूम नहीं
अपने को ही हमने सदा सच्चा बताया है
         अभी अभी मेरे दिल में--------

अपने खाने की याद रही औरों को हम भूल गये
जाने किसने जाने कबसे कुछ भी नहीं खाया है
सच्चाई क्या होती है इसकी हमे खबर नहीं
बस यही कहते रहते है ये सब उसकी माया है
         अभी अभी मेरे दिल में--------

रात गयी और बात गयी हो गयी है अब सुबह नयी
गमो की इन बरसातों में भी गीत ख़ुशी का गया है
जड़ छोड़कर चेतन बन जा बरना पाछे पछतायेगा 
मिल जाएगी मिटटी में ये तेरी कंचन काया है
         अभी अभी मेरे दिल में--------

चोरी डाका झूठ फरेब भरने लगा तू अपनी जेब 
अत्याचारी बनकर तुने क्या मानव धर्म निभाया है
मानव जन्म लिया है तो कुछ मानवता भी दिख्लादे 
भूल गया तू इस दुनिया में किसलिए आया है 
         अभी अभी मेरे दिल में--------


1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

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