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बाल दिवस पर


शिशुओं की दीजे संस्कार।
भर दो इनमें सुन्दर विचार।।
इनके मन सत्पथ पर मोड़ो,
सद्भावों को इनसे जोड़ो।
इनमें भेद को आने दो,
मन में ईष्र्या लाने दो।
भर दो स्नेह इनमें अपार।
शिशुओं को दीजे संस्कार।।
नित इन्हें सुभाषित पढ़वाओ,
वीरों की गाथा सुनवाओ।
हो मातृभूमि से प्रेम इन्हें,
ऐसा सुन्दर दो बोध इन्हें।
ये बनें राष्ट्र के कर्णधार।
शिशुओं को दीजे संस्कार।।
बच्चों को दो नित सद्विचार,
अन्त: में भर दो सदाचार।
आलस प्रमाद से दूरे रहें,
कत्र्तव्यों में भरपूर रहें।
शालीन शीलयुत हों उदार।
शिशुओं को दीजे संस्कार।।
हो इनमें सेवाभाव सदा,
हो देशभक्ति, सद्भाव सदा।
सब मातृभूमि हित जियें सदा,
कत्र्तव्य सुधा को पियें सदा।
जीवन का सुन्दर यही सार।
शिशुओं को दीजे संस्कार।।

दीप जलाओ


शिक्षा का शुभ दीप जलाओ।
संस्कृति से अज्ञान भगाओ।।
शिक्षा का सब दीप जलाओ,

ज्ञान प्रकाश सभी फैलाओ।
रहे न कहीं निरक्षरता-तम,
रहे न कोई अशिक्षित, अक्षम।
पढ़ो स्वावलम्बी बन जाओ।
शिक्षा का शुभ दीप जलाओ।।

जग में वही सर्व सुन्दर है,
ज्ञान-ज्योति जिसके अन्दर है।
वही श्रेष्ठ है, वही प्रेष्ठ है, 
जोकि ज्ञान विज्ञान ज्येष्ठ है।
पढ़कर सदा मानधन पाओ।
शिक्षा का शुभ दीप जलाओ।।

जो नर-नारि अपढ़ होते हैं, 
 निज सम्मान सदा खोते हैं।
वे समाज में सुयश न पाते, 
 लज्जित होते हैं लजियाते।
पढ़कर जीवन सफल बनाओ।
शिक्षा का शुभ दीप जलाओ।।

शिक्षित है समाज में ऊँचा, 
उससे बढ़कर कोई न दूजा।
शिक्षित के झण्डे लहराते, 
शिक्षित सदा उच्चपद पाते।
पढ़ो, जगत् में सुयश कमाओ।
शिक्षा का शुभ दीप जलाओ।।

राष्ट्रकविश्री मैथिलीशरण गुप्त के प्रति श्रद्धा सुमन

प्राण न पागल हो तुम यों, पृथ्वी पर वह प्रेम कहाँ..

मोहमयी छलना भर है, भटको न अहो अब और यहाँ..

ऊपर को निरखो अब तो बस मिलता है चिरमेल वहाँ..

स्वर्ग वहीं, अपवर्ग वहीं, सुखसर्ग वहीं, निजवर्ग जहाँ..


आप मानवता के आधार
दयामय द्वान्दातीत विचार
न कोई जाति, न वर्ग अशेष,
सभी को एक मात्र संदेश,
हृदय से दिया यही उपदेश,
उठाओ ऊँचा अपना देश।
देश के हित में जीना सार।
आप मानवता के आधार।।

पढ़ाया सबको निज साकेत,
काव्य में किया यही संकेत,
स्वार्थ का बने न कोई निकेत,
अरे मानवता के आधार।।
मनुज! बन जाओ सरल सती,
सुकवि की कहती पंचवटी।
शान्ति सुख पाता है सुकृती,
यशस्वी होता सत्यव्रती।
काम है बन्ध, मुक्ति उपकार,
आप मावनता के आधार।।

सुकविकी कृतियों का यह सार,
मनुज! तू बन करूणा आगार।
चित्र में धार्यसत्य आचार ,
हृदय में रामनाम को धार ।
नमन हे सुकवि, संत साकार
आप मानवता के आधार ।।

-डा. रामेश्वर प्रसाद गुप्त, दतिया

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