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विहर्ष गुरु-गुण चालीसा


विहर्ष गुरु-गुण चालीसा

- दोहा -

पंच परम परमेष्ठि को, वन्दूं बारम्बार ।
गुरु गुण चालीसा कहूं, जगजीवन हितकार ।।

- छन्द -

हे विराग सिंधु के परम शिष्य, हे गुरुवर मुनि विहर्षसागर ।
हे रत्नत्रय के आराधक, वात्सल्य सरोवर रत्नाकर ।
हे बाल ब्रह्मचारी तपधर, हे राष्ट्रसंत हे करुणाकर ।
हम चरण शरण में आए हैं, मम् हृदय विराजो योगीश्वर ।।

- चौपाई -

जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में, भारत के मध्य प्रदेश में ।
सागर जनपद बीना नगरी, धर्म प्राण और ज्ञान की गगरी ।।
सात मार्च सतहत्तर भाया, नव नक्षत्र धरा पर आया ।
मां आशा की आंख के तारे, दीपचन्द जी पिता तुम्हारे ।।
मात-पिता का मन हर्षाया, तव शुभ नाम 'विनोद' कहाया ।
आंगन नाचे ता ता थैया, मात पुकारे 'बंटी' भैया ।।
धर्म रुची बचपन से जागी, बचपन से ही थे वैरागी ।
बाल ब्रह्मचारी व्रत धारी, युवापने में दीक्षा धारी ।।
जब मन में वैराग्य समाया, ऐलक का बाना अपनाया ।
करत विहार भिंड को आए, क्षेत्र बरासो दर्शन पाए ।।
गुरु विरागसागर मन भाए, गुरु ने उनके भाग्य जगाए ।
उन्नीस सौ अठानवे सन् में, चौदह दिसम्बर के शुभ दिन में ।।
हर्ष सहित मुनि दीक्षा धारी, धारे पंच महाव्रत भारी ।
गुरु ने हर्षित रूप निहारा, विहर्षसागर नाम पुकारा ।।
गुरुवर की आंखों के तारे, विहर्षसागर संत हमारे ।
अट्ठाईस मूल गुण धारी, जीव मात्र के तुम हितकारी ।।
तुम बाईस परीषह जीते, सदा ज्ञान का अमृत पीते ।
विषय भोग की आशा त्यागी, मन में ज्ञान पिपासा जागी ।।
इन्द्रिय संयम, प्राणी संयम, मन को बस में रखते हरदम ।
परम दिगम्बर नग्न वेष में, कर विहार सम्पूर्ण देश में ।।
गुरुवर ने आचार्य बनाए, दीक्षा दो यह वचन सुनाए ।
क्षमा शान्ति समता के सागर, जय हो विश्व पूज्य रत्नाकर ।।
हित-मित-सत् उपदेश तुम्हारा, करता है कल्याण हमारा ।
मंगल प्रवचन ज्ञान प्रदाता, जो सुनता सद् मारग पाता ।।
आनन्द यात्रा आनन्द कारी, जन-जन को लगती अति प्यारी ।
तुम हो मुक्ति मार्ग के नायक, वीतराग वाणी परिचायक ।।
राग द्वेष सब तुमने त्यागे, तुम शिव सुन्दरि पर अनुरागे ।
मोह महा रिपु तुमसे हारा, कामदेव को तुमने मारा ।।
सम्मेद शिखर पर संकट आया, शासन ने फरमान सुनाया ।
पर्यटन स्थल बनवायेंगे, देश-विदेशी जन आएंगे ।।
गुरुवर को यह बात ना भायी, भक्तों की संगति बुलवायी । 
लाल किले से बिगुल बजाया, दिल्ली का आसन कम्पाया ।।
नतमस्तक सरकार हो गई, धर्म की जय जयकार हो गई ।
श्रावकगण दर्शन को आवें, दर्शन कर मन में हर्षावें ।।
गुरुवर हैं आनन्द शिरोमणि, धर्म शिरोमणि, तीर्थ शिरोमणि ।
ज्ञान शिरोमणि, ध्यान शिरोमणि, त्याग और वात्सल्य शिरोमणि ।।
कुन्दकुन्द के तुम लघुनन्दन, हम करते चरणों में वंदन ।
"चन्दर" यही भावना भाए, विहर्ष सागर सा बन जाए ।।

- दोहा -

जो यह चालीसा पढ़े, भक्ति भाव उर धार ।
विहर्ष सिन्धु समान बन, हो भवसागर पार ।।
रचयिता-  पं. चन्द्र प्रकाश जैन 'चन्दर' ग्वालियर

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