रचनाएँ

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

फिर नज़र से ............


फिर नज़र से पिला दिजीये!
होश मेरे उडा दिजीये...

छोडीये दुश्मनी की रज़िश
अब जरा मुस्कुरा दिजीये..

बात अफसाना बन जायेगी
इस कदर मत हवा दिजीये..

आइए खुल के मिलीए गले
सब तखल्लुक हटा दिजीये..

कब से मुस्ताके दिदार हूं
अब तो जलवा दिखा दिजीये॥

-जगजीत सिंह की 'आयना' से

4 टिप्‍पणियां:

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

nazar se gazal ko saja diya.
aapne bejod rachana bana diya,

fir nazar se...ko bahut bahut badhayi..sundar rachana..

sada ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

ओम आर्य ने कहा…

खुबसूरत नज़्म

नीरज गोस्वामी ने कहा…

वाह आनंद आ गया...आपका ब्लॉग सब से अलग और बहुत खूबसूरत है...बिलकुल एक जिंदादिल इंसान की तरह..अंग्रेजी में इसके लिए जो शब्द है " बबली".
नीरज

 

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