रविवार, 13 दिसंबर 2009

अन्धयारी गलियां



काँटों पैर चलने वाली हूँ फूलो की सय्या क्या जानू
जब अपनों को ही भूल गई मैं भूल भुलायिया क्या जानू
ये धरती मेरा बिस्तर है और अम्बर मेरी चादर है
मैं खेल रही तूफानों से मेरा अपना जीवन पतझड़ है
टुकड़ों पर पलने वाली हूँ मैं दुध मलाई क्या जानू
काँटों पैर चलने वाली हूँ फूलो की सय्या क्या जानू
अपना दुखमय जीवन बिता इन अंधियारी गलियों में
आज तलक मैं रही हूँ वंचित दुनिया की रंग रालिओं से
परहित में अर्पित तन मन धन मैं ता-ता थैया क्या जानू
काँटों पैर चलने वाली हूँ फूलो की सय्या क्या जानू
जीवन से सिखा है मैं आंसू पीना मुह को सीना
सीख लिया दुनिया से मैंने घुट-घुट कर जीना
मैं गुरु चरणों मैं लीन रही मैं राम रम्या क्या जानू
काँटों पैर चलने वाली हूँ फूलो की सय्या क्या जानू

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