शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

दर्द


अपने ज़ख्म ज़माने  को दिखता रहा हू मैं
सीने में एक दर्द को छिपाता रहा हू मैं
ज़ालिम ने दिल के बदले दर्द क्यों दिया
छिप छिप के आँसू बहाता रहा हू मैं 

आयेगी वो कभी लौटकर यही आस लिए 
अपने  दिल  को हरपल समझाता रहा हू मैं 
मालूम था मुझे  कि  संगदिल है वो तो 
फिर भी जाने क्यू उसे ही चाहता रहा हू मैं 

2 टिप्‍पणियां:

alka sarwat ने कहा…

दिल के बदले दर्द ही मिलता है भाई,
अच्छी भावनाएं

ana ने कहा…

bahut khub

 

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