बुधवार, 19 अगस्त 2009

राष्ट्रकविश्री मैथिलीशरण गुप्त के प्रति श्रद्धा सुमन

प्राण न पागल हो तुम यों, पृथ्वी पर वह प्रेम कहाँ..

मोहमयी छलना भर है, भटको न अहो अब और यहाँ..

ऊपर को निरखो अब तो बस मिलता है चिरमेल वहाँ..

स्वर्ग वहीं, अपवर्ग वहीं, सुखसर्ग वहीं, निजवर्ग जहाँ..


आप मानवता के आधार
दयामय द्वान्दातीत विचार
न कोई जाति, न वर्ग अशेष,
सभी को एक मात्र संदेश,
हृदय से दिया यही उपदेश,
उठाओ ऊँचा अपना देश।
देश के हित में जीना सार।
आप मानवता के आधार।।

पढ़ाया सबको निज साकेत,
काव्य में किया यही संकेत,
स्वार्थ का बने न कोई निकेत,
अरे मानवता के आधार।।
मनुज! बन जाओ सरल सती,
सुकवि की कहती पंचवटी।
शान्ति सुख पाता है सुकृती,
यशस्वी होता सत्यव्रती।
काम है बन्ध, मुक्ति उपकार,
आप मावनता के आधार।।

सुकविकी कृतियों का यह सार,
मनुज! तू बन करूणा आगार।
चित्र में धार्यसत्य आचार ,
हृदय में रामनाम को धार ।
नमन हे सुकवि, संत साकार
आप मानवता के आधार ।।

-डा. रामेश्वर प्रसाद गुप्त, दतिया

2 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

राष्ट्र कवि को मेरी हार्दिक श्रदांजली ! उनकी लिखी अच्छी पंक्तिया ढूंढ कर लाये आप !

Suman ने कहा…

nice

 

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