मंगलवार, 24 नवंबर 2009

ज़िन्दगी

बहुत अजीब है ये ज़िन्दगी
कब किस मोड़ पे आकार रुक जाती है
बगैर कोई रुकावट की आगाह किए

लड़खड़ाते…सँभालते
अपने आप को समझाते
कि ये अनुभव भी हमे
कुछ न कुछ तो निश्चित रूप से
सिखलाएगा ही

ह्रदय को निचोडती है कुछ पल
जब खालीपन डट कर बैठ जाता है
शुन्य को केन्द्र बनाये
मन हताश …कौन समझाए!

घड़ी के काँटों को जैसे किसी बलवान ने
दबोच लिया है अपने पूरी शक्ति से
न छत्त रहे हैं उदासीनता के बादल
न ठंडक मिल रही है ह्रदय को
सुबह की ओस की ताजगी से

न उम्मीद झांक रही है
खिलते पंखुड़ियों की तरह
न बसंत आस पास फटक रही है
जैसे की कोई शिकवा हो

बस यही आसरा है कि
ऐसे दिनों का भी अंत होता है
समय मरहम लगता है
और एक दिन गेहेरे घाव भी
एक दाग बन कर रह जाते हैं.

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